
सम्पादकीय: हिन्दू निवाले बन गए हैं
बंगाल में ममता बानो पालित राक्षसों का बढ़ता प्रकोप दर्दनाक और डरावना है। टी एम सी के हिन्दू गुंडे नेता दरबे के मुर्गे हैं जिन्हें दाना चुगने से तब तक फुर्सत नहीं मिलेगी जब तक कसाइयों द्वारा उनके कटने की बारी न आ जाए। ऐसे इस्लामी दंगाइयों को हिन्दुओं के घरों, दुकानों, स्त्री - बच्चों को मारने लूटने जलाने के लिए मात्र बहाना चाहिए होता है। वे निरन्तर अपने जिहादी कलुषित कारनामों को बढ़ाने के लिए समाज एवं प्रशासन के प्रत्येक क्षेत्र में कार्यरत हैं क्योंकि कुरान उन्हें गैर इस्लामियों को खत्म करने के लिए साम, दाम, दण्ड, भेद के अलावे पाप कहे जाने वाले सभी कुकर्मों को करने की इजाजत देता है। दुनियाँ में फैल रहे इस्लामिक क्रूरता, बर्बरता, वहशीपन, अमानवीय कुकर्मों के उदाहरण इतिहास में ही नहीं वर्तमान में भी भरे पड़े हैं। आश्चर्य तब होता जब सारी जानकारी होने के बावजूद भी दुनियाँ के सभ्य और ताकतवर समाज इस पर प्रतिबन्ध नहीं लगा पा रहे हैं। उदारवादी कहे जाने वाले देश इंग्लेंड, जर्मनी एवं अन्य भी बहुत से देश इस बर्बर इस्लामियों को शरण देने की गलती कर उसके दुःखद परिणामों को भुगत रहे हैं।
भारत में तो जिहादियों के अत्याचार और दंगे प्रतिदिन के समाचार में वर्णित हैं जो कभी बंगलोर, कभी संभल, कभी हैदराबाद, कभी मुजफ्फराबाद, कभी नागपुर तो पश्चिम बंगाल एवं बिहार के इलाके में परिलक्षित होते हैं । सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है यहाँ तक पुलिस भी पिट रही है। एम्बुलेंस के गैर इस्लामिक मरीजों को हस्पताल नहीं पहुंचने दिया जा रहा है। हिन्दू बच्चों को घेर कर मुस्लिमों द्वारा मारा जा रहा है। मुस्लिमों, ईसाइयों के लिए स्वतः संज्ञान लेने वाली अदालतें और भारत के चिल्लाते मानवाधिकार वाले भी हिन्दुओं की हत्याओं पर गधे के सिर के सिंघ की तरह गायब हो जाते हैं। विभिन्न अदालतों के जजों की आत्मा जो आतंकियों, अपराधियों को छुड़ाने के लिए बीच रात में भी अदालतें लगाती हैं, वे पीड़ित हिन्दुओं को कभी न्याय नहीं दिला पाती है। क्यों नहीं दिला पाती है? उसका रहस्य तो जस्टिस वर्मा के घर में आग लगने के बाद ही प्रमाण के साथ उजागर हुआ है। अभी तो तकनीक की जागृति के कारण कई छुपे मुद्दे जनता के संज्ञान में आ ही जाते हैं फिर भी असमर्थ हिंदू क्या करे? कैसे अपने देश में अपने धर्म, अपने परिवार, अपनी जायदाद या जीवन यापन के साधनों की रक्षा करे। इन्हें तो हर कोई विभिन्न तरीकों निगलने को तैयार रहते हैं।
बचपन के बगिया वाली कहानी याद आती है जिसमें बच्चों को मार कर खाने वाली बुढ़िया पेड़ चढ़े हुए बच्चे से बगिया मांगती है, पेड़ से तोड़ कर जब बच्चा उसे गिराना चाहता है तो वह उसे नीचे उतर कर देने के लिए कहती है, जहाँ वह बच्चे को थैले में कैद कर लेती है। बहाना यह है कि अगर हाथ में दोगे तो हाथ ही उसे खा जाएगा, मुँह में दोगे तो मुँह ही उसे खा जाएगा, थैले में गिराओगे तो थैला खा जायेगा । वस्तुतः आज के सन्दर्भ में हिन्दू उस बच्चे या बगिया की तरह है जिसे खाने के लिए न्यायिक प्रणाली, नेता, प्रशाशन, और गैर हिंदू समाज के जिहादी एवं उनके तलवे चट्टू दोगले सेकुलर कहे जाने वाले नेता भी सदैव तत्पर रहते हैं।
